Rama Sharma

Being a girl in a man's world

When she was born, the atmosphere was more of gloom than of happiness. Reason? Because a girl child was born. But rather than being the ‘burden,’ she turned out to be best support her parents could have.

राजस्थान के छोटे से शहर में मैंने जन्म लिया। जैसा कि मेरी माँ ने मेरे बड़े होने पर मुझे बताया कि मेरे जन्म पर कोई खास खुश नहीं हुआ, अपितु मेरी दादी को इस बात का बहुत दुःख था उन्हें उनका कुलदीपक नहीं मिल पाया। 3 वर्ष की उम्र में मैंने स्कूल जाना शुरू कर दिया और 8 साल की नन्ही उम्र में मैं बोर्डिंग स्कूल पढ़ने चली गयी ताकि, मैं बारहवीं तक की पढ़ाई सरकार द्वारा प्रायोजित नवोदय विद्यालय में कर सकूं। स्कूल के समय से ही मैं एक मेधावी छात्रा रही। मेरी आँखों ने हमेशा डॉक्टर बनने का सपना देखा था। बारहवीं की परीक्षा साइंस से पास करने के बाद जब मैं हॉस्टल से हमेशा के लिए घर लौटी तब मैंने ये जाना कि हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, कारणवश मैं साइंस नहीं पढ़ सकती थी और ना ही कभी डॉक्टर बन सकती थी।

फिर भी हार न मानते हुए मैंने अपनी आगे की पढ़ाई आर्ट्स में जारी रखी। मेरी पढ़ाई का बोझ पापा पर ना पड़े इसलिए मैंने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया और साथ में कुछ ट्यूशन भी लिए। अपने पढ़ाई के खर्चे के साथ-साथ अब मैं घर के खर्चे भी उठाने लगी थी। ग्रेजुएशन ख़त्म करने के बाद मैंने आर्मी की एक परीक्षा दी। चार साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद मैं भारतीय सेना का एक हिस्सा बन चुकी थी और अपने माता पिता का सहारा बनने में भी सक्षम थी। मेरे पापा का स्वास्थय अब ठीक नहीं रहता था और उनकी दुकान बंद हो चुकी थी। इसी कारण मेरी दीदी की शादी और 2 छोटे भाइयों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी और घर का खर्चा अब मेरे जिम्मे था। समय के साथ मैंने अपनी हर ज़िम्मेदारी को पूरा किया। अपने माता पिता के लिए एक घर ख़रीदा , दीदी की शादी की और भाइयों की पढाई पूरी करवाई।

कहते हैं ना बेटियाँ तो परायी ही होती हैं , मुझे भी किसी और का घर बसाने जाना था। किन्तु मैं अपनी शादी का बोझ मेरे पापा पर नहीं डालना चाहती थी। इसीलिए मैंने बैंक से लोन लेकर अपनी शादी का खर्चा खुद उठाया। आज मैं कहने को परायी हूँ, किन्तु अपने माता पिता की हर संभव सहायता करने के लिए आज भी तत्पर हूँ। मेरे घर के वारिस आज भी अपनी पढाई कर रहे हैं और नौकरी की तलाश में हैं। मेरा परिवार आज किराये के घर में नहीं बल्कि मेरे ख़रीदे हुए घर में रहता है।

मैंने ऐसा कोई विशेष कार्य समाज के लिए नहीं किया है जिसके लिए मुझसे कोई प्रेरित हो किन्तु मैंने उन दकियानूसी विचारों को तोडा है जो सोचते हैं कि लड़के ही अपने माता पिता का सहारा बन सकते हैं। मैंने करारा जवाब दिया है उन लोगों को जो सोचते हैं कि लड़की के पैदा होते ही उसकी शादी के लिए पैसा इकठ्ठा करना शुरू कर देना चाहिए। मैंने मुँह बंद किया है उन लोगों का जो लड़कियों को लड़कों से काम आंकते हैं। मेरी कहानी है उन सब लड़कियों के लिए जो अपने हौंसलों के पंखों से बुलंदी की चोटी तक पहुंचना चाहतीं हैं।


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